जिद ......

  बर्बाद होकर जीवन में,
कुछ करने की जिद आती है।
उसी जिद पर चलने की,
कोशिश कर रहा हूँ ।

बर्बाद तो हो चुका ,
खोने के लिए क्या बचा है ?
शिवाय थोड़ी सी इज्जत ,
और  आत्मसम्मान ।

उसी आत्मसम्मान के लिए,
कुछ करना चाहता हूँ ।
एक नया आत्म सम्मान,
और इज्जत पाना चाहता हूँ ।
आसमा की बुलंदी पर चढ़ना चाहता हूँ ।

 मिस चांस वाले पत्थर बहुत मारे,
 आम नहीं गिरे पर,
 निशाना लगाने की  जिद आ चुकी।
 उसी जिद पर चलना चाहता हूँ ।
 जीवन में कोशिश करना चाहता हूँ ।

जीते तो वह भी है।
जो भिखारी की तरह,
टुकड़ों पर संवरते हैं,
पर मै तो जिद से,
आत्मसम्मान और इज्जत से ,
उसीके लिए जीना चाहता हूँ ।
जो मुझे आसमां तक सफर कराएगा।
जीवन जीना सिखाएगा ।
उस पल के लिए जीना चाहता हूँ।

 बर्बाद होकर ही जीवन में,
कुछ करने की जिद आती है।
उसी जीत के लिए ,
जिदसे उसी राह पर चलके,
ऊंचाई पर पहुंचना चाहता हूँ ।

मै जिद्दी होना चाहता हूँ ।.............
                                     -nikhil kusale 

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